Skip to Content

Maa Ne Bete Ke Agniveer Banne Ke Sapne Ke Liye Girvi Rakha Mangalsutra, Doosri Or Jatigat Nafrat Ke Naron Ne Khade Kiye Samajik Nyay Aur Samanata Par Sawaal

विशेष विश्लेषण | रोजगार, आर्थिक असमानता, अग्निवीर योजना, SC/ST कानून और UGC नियमों के बीच उलझता सामाजिक विमर्श
5 November 2026 by
Maa Ne Bete Ke Agniveer Banne Ke Sapne Ke Liye Girvi Rakha Mangalsutra, Doosri Or Jatigat Nafrat Ke Naron Ne Khade Kiye Samajik Nyay Aur Samanata Par Sawaal
YHT Store, yuva hind trust
| No comments yet

मां ने बेटे के अग्निवीर बनने के सपने के लिए गिरवी रखा मंगलसूत्र, दूसरी ओर जातिगत नफरत के नारों ने खड़े किए सामाजिक न्याय और समानता पर सवाल

विशेष विश्लेषण | रोजगार, आर्थिक असमानता, अग्निवीर योजना, SC/ST कानून और UGC नियमों के बीच उलझता सामाजिक विमर्श

नई दिल्ली/बिहार।

देश में एक ओर युवा भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का सपना देखते हैं, तो दूसरी ओर आर्थिक तंगी, महंगी कोचिंग, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियां उनके रास्ते में खड़ी दिखाई देती हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर प्रसारित एक भावनात्मक वीडियो ने एक बार फिर देश में आर्थिक असमानता, जातिगत पहचान, आरक्षण, सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस छेड़ दी है।

सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावे के अनुसार, अग्निवीर भर्ती की शारीरिक एवं लिखित परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग करने गए कार्तिक शर्मा नामक युवक की मां को बेटे की पढ़ाई के लिए 10 हजार रुपये जुटाने के उद्देश्य से अपना मंगलसूत्र गिरवी रखना पड़ा। दावा है कि इसके बदले उन्हें प्रतिमाह तीन प्रतिशत ब्याज चुकाना होगा और समय पर कर्ज नहीं चुकाने की स्थिति में मंगलसूत्र हाथ से निकल सकता है।

हालांकि, इस वीडियो के साथ प्रसारित युवक की पहचान, जातिगत विवरण, गिरवी रखने की वास्तविक परिस्थितियों और ऋण की शर्तों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन तथ्यों को फिलहाल सोशल मीडिया पर किए गए दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

लेकिन यदि यह घटना सही है, तो यह केवल एक परिवार की आर्थिक मजबूरी की कहानी नहीं है, बल्कि देश के उन हजारों गरीब परिवारों की परिस्थितियों को सामने लाने वाला उदाहरण है, जहां माता-पिता अपनी जरूरतों और इच्छाओं का त्याग करके बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष करते हैं।

1. बेटे के भविष्य के लिए मां का मंगलसूत्र गिरवी रखना: आखिर कैसी है रोजगार की यह लड़ाई?

भारतीय समाज में मंगलसूत्र केवल सोने का आभूषण नहीं, बल्कि अनेक परिवारों के लिए भावनात्मक और पारिवारिक महत्व रखने वाला प्रतीक है।

ऐसे में यदि किसी मां को अपने बेटे की पढ़ाई और रोजगार की तैयारी के लिए मंगलसूत्र गिरवी रखना पड़े, तो यह आर्थिक परिस्थितियों की गंभीरता को दर्शाता है।

सवाल यह है कि देश की रक्षा करने का सपना देखने वाले युवाओं को अपनी तैयारी के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने में इतनी कठिनाइयों का सामना क्यों करना पड़ता है?

ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेक परिवारों के पास न तो महंगी कोचिंग संस्थानों की फीस देने की क्षमता है और न ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं।

शारीरिक प्रशिक्षण, लिखित परीक्षा की तैयारी, आवागमन, भोजन, रहने और अध्ययन सामग्री का खर्च गरीब परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।

यदि किसी परिवार को महज 10 हजार रुपये की व्यवस्था करने के लिए अपने घर के कीमती आभूषण गिरवी रखने पड़ें, तो यह सवाल केवल उस परिवार का नहीं रह जाता। यह युवाओं के लिए समान अवसर और सरकारी भर्ती की तैयारी की आर्थिक पहुंच से जुड़ा विषय बन जाता है।

2. अग्निवीर योजना और युवाओं के भविष्य का सवाल

केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 में अग्निपथ योजना शुरू की थी। इसके तहत सेना में भर्ती होने वाले युवाओं को अग्निवीर के रूप में चार वर्ष की सेवा का अवसर दिया गया।

योजना की मूल व्यवस्था के अनुसार, चार वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद प्रदर्शन, योग्यता और संगठनात्मक आवश्यकता के आधार पर प्रत्येक बैच के अधिकतम 25 प्रतिशत अग्निवीरों को नियमित कैडर में शामिल करने का प्रावधान था।

शेष अग्निवीरों को सेवा निधि पैकेज दिया जाना था।

इस व्यवस्था को लेकर युवाओं के बीच रोजगार की स्थिरता, भविष्य की नौकरी और चार वर्ष बाद के करियर को लेकर लगातार चर्चा होती रही है।

लेकिन 4 नवंबर 2026 को इस व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा हुई।

रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार:

  • पहले की व्यवस्था के तहत 25 प्रतिशत अग्निवीरों को योग्यता के आधार पर नियमित सेवा में लेने का प्रावधान जारी रहेगा।

  • शेष 75 प्रतिशत अग्निवीरों को उनकी इच्छा के आधार पर दो वर्ष की अतिरिक्त सेवा का अवसर दिया जाएगा।

  • इस अतिरिक्त अवधि के बाद उन्हें नियमित सैनिक के रूप में शामिल होने का अवसर दिया जाएगा।

  • इसके लिए संबंधित अभ्यर्थियों की सहमति और निर्धारित चयन एवं पात्रता शर्तें पूरी करना आवश्यक होगा।

इस घोषणा को युवाओं के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण बदलाव माना जा सकता है। हालांकि, नियमित नियुक्ति को स्वतः मिलने वाला अधिकार समझना उचित नहीं होगा। घोषित व्यवस्था में चयन और पात्रता की शर्तें महत्वपूर्ण रहेंगी।

ऐसे में अग्निवीर बनने की तैयारी कर रहे युवाओं और उनके परिवारों को भर्ती की आधिकारिक शर्तों की जानकारी रखना आवश्यक है।

3. क्या गरीब परिवारों के बच्चों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी समान रूप से आसान है?

भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। ग्रामीण इलाकों से निकलकर देश की सर्वोच्च परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने वाले युवाओं की लंबी सूची है।

लेकिन प्रतिभा और अवसर के बीच आर्थिक स्थिति एक बड़ा अंतर पैदा करती है।

एक संपन्न परिवार का बच्चा अच्छे कोचिंग संस्थान में पढ़ सकता है, महंगे प्रशिक्षण केंद्र में शारीरिक तैयारी कर सकता है और परीक्षा की तैयारी के लिए आवश्यक संसाधन आसानी से जुटा सकता है।

इसके विपरीत गरीब परिवार का बच्चा कई बार पढ़ाई के साथ मजदूरी, पारिवारिक जिम्मेदारियों और आर्थिक समस्याओं से भी संघर्ष करता है।

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या सरकार को सेना भर्ती सहित अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ग्रामीण एवं आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था और मजबूत नहीं करनी चाहिए?

क्या जिला स्तर पर सरकारी शारीरिक प्रशिक्षण केंद्र, निःशुल्क लिखित परीक्षा कोचिंग, पुस्तकालय और ऑनलाइन अध्ययन सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जानी चाहिए?

देश के लिए सैनिक तैयार करना केवल सेना की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज और सरकार की भी सामूहिक जिम्मेदारी है।

4. SC/ST कानून 2018: संरक्षण का उद्देश्य और निष्पक्ष न्याय की आवश्यकता

सोशल मीडिया पर प्रसारित पोस्ट में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के वर्ष 2018 के संशोधन का भी उल्लेख किया गया है।

इस विषय को भावनाओं के बजाय कानूनी तथ्यों के आधार पर समझना आवश्यक है।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और जनजातियों के विरुद्ध होने वाले जातिगत अत्याचार, उत्पीड़न और भेदभाव को रोकना है।

वर्ष 2018 में संसद ने इस कानून में संशोधन करते हुए धारा 18A जोड़ी थी।

इस संशोधन के प्रमुख प्रावधानों में शामिल हैं:

  1. इस अधिनियम के तहत FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं होगी।

  2. आवश्यक होने पर गिरफ्तारी के लिए किसी सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति अनिवार्य नहीं होगी।

  3. अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत संबंधी प्रतिबंधों को बहाल किया गया।

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भी समझना जरूरी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 में पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट किया था कि यदि शिकायत से प्रथम दृष्टया इस अधिनियम के तहत अपराध नहीं बनता है, तो अग्रिम जमानत पर विचार करने का अधिकार न्यायालय के पास बना रहता है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इस कानून में किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत होते ही उसे बिना किसी न्यायिक परीक्षण के दोषी मान लिया जाता है।

कानून का उद्देश्य पीड़ितों को संरक्षण देना है, न कि किसी निर्दोष व्यक्ति को दंडित करना।

इसीलिए आवश्यक है कि कानून का क्रियान्वयन संवेदनशीलता, निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप हो।

सामाजिक न्याय और निष्पक्ष न्याय एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के दो आवश्यक आधार हैं।

5. UGC नियमों को लेकर विवाद: उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता की बहस

सोशल मीडिया पर प्रसारित संदेश में BHU, AMU और JNU जैसे विश्वविद्यालयों का उल्लेख करते हुए जातिगत नारों और UGC नियमों पर सवाल उठाए गए हैं।

यहां एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम को समझना आवश्यक है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से University Grants Commission (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 अधिसूचित किए थे।

इन नियमों का घोषित उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना था।

लेकिन नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ।

कुछ याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि नियमों में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को जातिगत भेदभाव के विरुद्ध समान संरक्षण क्यों नहीं दिया गया।

दूसरी ओर, सामाजिक न्याय से जुड़े संगठनों का तर्क रहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित समुदायों के विद्यार्थियों के सामने मौजूद भेदभाव को रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था आवश्यक है।

29 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने इन नए नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी और वर्ष 2012 के नियमों को अगले आदेश तक लागू रखने का निर्देश दिया।

इसके बाद 20 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि इन नियमों पर पुनर्विचार किया जा रहा है।

अर्थात नवंबर 2026 की स्थिति में 2026 के नए UGC नियमों को लागू मानकर उनका उल्लेख करना सही नहीं होगा। उनकी न्यायिक स्थिति और केंद्र सरकार की पुनर्विचार प्रक्रिया को ध्यान में रखना आवश्यक है।

यह विवाद एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रखता है:

क्या उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसा मजबूत और निष्पक्ष शिकायत निवारण तंत्र नहीं होना चाहिए, जो जाति चाहे कोई भी हो, किसी भी विद्यार्थी के साथ होने वाले भेदभाव और उत्पीड़न को गंभीरता से ले?

विश्वविद्यालयों में किसी भी समुदाय के विद्यार्थी को अपमान, धमकी या भेदभाव का सामना नहीं करना चाहिए।

6. 'ब्राह्मण तेरी कब्र खुदेगी' जैसे नारों पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए

सोशल मीडिया पर प्रसारित पोस्ट में BHU, AMU और JNU के संदर्भ में 'ब्राह्मण तेरी कब्र खुदेगी' जैसे नारे का उल्लेख किया गया है।

यदि किसी शैक्षणिक संस्थान या सार्वजनिक स्थान पर वास्तव में किसी जाति विशेष के विरुद्ध इस प्रकार का नारा लगाया गया है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

किसी भी जाति, धर्म या समुदाय के लोगों के विरुद्ध हिंसा, धमकी अथवा सामूहिक घृणा फैलाने वाली भाषा स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज के अनुकूल नहीं है।

ब्राह्मण समुदाय के किसी व्यक्ति को उसकी जातिगत पहचान के कारण अपमानित करना गलत है। इसी प्रकार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग या किसी अन्य समुदाय के व्यक्ति के विरुद्ध अपमानजनक भाषा और भेदभाव भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।

भारतीय संविधान सभी नागरिकों की गरिमा और समानता की रक्षा करता है।

किसी एक समुदाय के साथ हुए अन्याय का समाधान दूसरे समुदाय के विरुद्ध नफरत फैलाना नहीं हो सकता।

यदि किसी विश्वविद्यालय में ऐसी घटना हुई है, तो संबंधित प्रशासन को वीडियो, शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच कर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।

हालांकि, किसी नारे को किसी विश्वविद्यालय की आधिकारिक नीति या वहां के सभी विद्यार्थियों की सोच मान लेना भी उचित नहीं है।

7. संविधान के सामने सभी नागरिक समान: अधिकार और जिम्मेदारियां दोनों जरूरी

भारतीय संविधान की प्रस्तावना प्रत्येक नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और उपासना की स्वतंत्रता देने का संकल्प व्यक्त करती है।

संविधान के कुछ महत्वपूर्ण अनुच्छेद इस बहस को समझने में मदद करते हैं।

अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण।

अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक तथा कुछ वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति।

अनुच्छेद 16: सरकारी रोजगार में अवसर की समानता तथा संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार आरक्षण की व्यवस्था।

अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन।

अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण।

अनुच्छेद 46: अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और समाज के कमजोर वर्गों के शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों को बढ़ावा देने का राज्य का दायित्व।

इन प्रावधानों को साथ रखकर देखने पर स्पष्ट होता है कि संविधान का उद्देश्य किसी समुदाय को दूसरे समुदाय के विरुद्ध खड़ा करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक असमानताओं को दूर करते हुए सभी नागरिकों की गरिमा सुरक्षित करना है।

इसलिए सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं की समस्याओं पर चर्चा करना भी जरूरी है और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के नागरिकों के साथ होने वाले वास्तविक अत्याचारों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है।

एक का अधिकार दूसरे का अधिकार छीनने का आधार नहीं बनना चाहिए।

8. सरकार के सामने कुछ महत्वपूर्ण सवाल

कार्तिक शर्मा की मां द्वारा मंगलसूत्र गिरवी रखने का सोशल मीडिया पर किया गया दावा यदि सही है, तो यह सरकार और समाज के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है।

  1. क्या आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए सेना भर्ती की तैयारी हेतु निःशुल्क प्रशिक्षण केंद्रों का विस्तार नहीं होना चाहिए?

  2. क्या प्रत्येक जिले में शारीरिक प्रशिक्षण और लिखित परीक्षा की तैयारी के लिए सरकारी व्यवस्था विकसित नहीं की जानी चाहिए?

  3. क्या ग्रामीण प्रतिभाओं को बेहतर अध्ययन सामग्री और डिजिटल शिक्षा की सुविधा नहीं मिलनी चाहिए?

  4. क्या उच्च शिक्षण संस्थानों में सभी वर्गों के विद्यार्थियों के लिए निष्पक्ष शिकायत निवारण व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होनी चाहिए?

  5. क्या जातिगत भेदभाव और जाति के नाम पर धमकी देने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

  6. क्या कानूनों के दुरुपयोग की आशंका और वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने की आवश्यकता, दोनों पर समान गंभीरता से विचार नहीं होना चाहिए?

  7. क्या सरकार को युवाओं के रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए और ठोस कदम नहीं उठाने चाहिए?

9. देश को जातिगत संघर्ष नहीं, समान अवसर और सामाजिक सद्भाव चाहिए

भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। यहां अलग-अलग जातियों, धर्मों, भाषाओं और परंपराओं के लोग एक साथ रहते हैं।

सेना में भर्ती होने वाला युवा जब वर्दी पहनता है, तो उसकी सबसे बड़ी पहचान देश का सैनिक होना है।

सीमा पर तैनात जवान की जिम्मेदारी किसी एक जाति या समुदाय की रक्षा करना नहीं, बल्कि पूरे देश की सुरक्षा करना है।

इसी भावना को समाज के भीतर भी मजबूत करने की आवश्यकता है।

यदि कोई गरीब मां अपने बेटे को सेना में भेजने के लिए अपना मंगलसूत्र गिरवी रखती है, तो समाज का दायित्व है कि उस परिवार की आर्थिक मजबूरी को समझे और जरूरत पड़ने पर उसकी सहायता करे।

यदि किसी विद्यार्थी को जाति के कारण अपमानित किया जाता है, तो उसे न्याय मिलना चाहिए।

यदि किसी व्यक्ति को उसकी जातिगत पहचान के कारण धमकी दी जाती है, तो कानून को उसके संरक्षण के लिए आगे आना चाहिए।

और यदि किसी कानून का क्रियान्वयन अनुचित तरीके से होता है, तो उसके सुधार और निष्पक्षता पर लोकतांत्रिक तरीके से चर्चा होनी चाहिए।

न्याय किसी एक जाति की संपत्ति नहीं है। समानता किसी एक वर्ग का विशेषाधिकार नहीं है और संविधान किसी एक समुदाय का दस्तावेज नहीं है। यह पूरे भारत के नागरिकों का साझा संवैधानिक आधार है।

निष्कर्ष: सवाल किसी जाति से नहीं, व्यवस्था से होना चाहिए

कार्तिक शर्मा की मां के मंगलसूत्र गिरवी रखने की कहानी की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। लेकिन इसके माध्यम से उठने वाले आर्थिक और सामाजिक सवालों की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

देश का युवा सेना में जाने का सपना देखता है, लेकिन उसके परिवार को तैयारी के लिए कर्ज लेना पड़े, यह आर्थिक असमानता की ओर ध्यान दिलाता है।

उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए नियम बनें, लेकिन उनका क्रियान्वयन सभी विद्यार्थियों के संवैधानिक अधिकारों और निष्पक्षता के अनुरूप हो।

SC/ST समुदायों को ऐतिहासिक अन्याय से संरक्षण मिले और सामान्य वर्ग के नागरिकों की गरिमा एवं अधिकार भी सुरक्षित रहें।

देश को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है, जहां किसी मां को बेटे के भविष्य के लिए अपना मंगलसूत्र गिरवी रखने की मजबूरी न हो, किसी युवा को जाति के कारण अपमानित न होना पड़े और किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोपों के भय में जीवन न बिताना पड़े।

अंततः भारत की पहचान जातिगत श्रेष्ठता या जातिगत संघर्ष से नहीं, बल्कि न्याय, समानता, बंधुत्व और राष्ट्रीय एकता से होनी चाहिए।

YHT 24X7 NEWS का सवाल:

क्या सरकार को गरीब परिवारों के युवाओं के लिए सेना भर्ती की तैयारी निःशुल्क और सुलभ बनाने की दिशा में विशेष पहल करनी चाहिए? क्या जातिगत भेदभाव रोकने वाले कानूनों और नियमों में सभी नागरिकों के लिए निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए?

अपनी राय तथ्यों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर जरूर रखें।

विशेष रिपोर्ट: YHT 24X7 NEWS

संपादकीय डेस्क

Maa Ne Bete Ke Agniveer Banne Ke Sapne Ke Liye Girvi Rakha Mangalsutra, Doosri Or Jatigat Nafrat Ke Naron Ne Khade Kiye Samajik Nyay Aur Samanata Par Sawaal
YHT Store, yuva hind trust 5 November 2026
Share this post
Tags
Archive
Sign in to leave a comment