इनसे मिलिए — 22 वर्षीय माया पाण्डेय
एक चेहरा, जो मुस्कुराता है… लेकिन सवाल पूछता है
ठाणे की एक सर्द शाम।
कॉलेज से लौटती एक लड़की, किताबें कंधे पर और जिम्मेदारियाँ दिल में।
नाम है माया पाण्डेय, उम्र महज़ 22 साल।
माया कोई बड़ी नेता नहीं, कोई वायरल स्टार नहीं।
वह B.Com की छात्रा है।
उसका सपना साधारण है — पढ़ना, आगे बढ़ना और अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकालना।
लेकिन माया की सुबह कॉलेज से नहीं,
घर की चिंताओं से शुरू होती है।
पिता की छोटी-सी नौकरी,
दो छोटे भाई,
और बढ़ती ज़रूरतें।
इसलिए माया ने वह रास्ता चुना,
जो अक्सर हम अनदेखा कर देते हैं।
कॉलेज से लौटकर,
शाम होते ही वह चाट और गोलगप्पे का ठेला लगाती है।
रात 10–11 बजे तक।
ठंड हो या तपती धूप —
चेहरे पर मुस्कान,
लेकिन भीतर एक थकान… जो हर दिन गहरी होती जाती है।
जब मीडिया ने उससे पूछा —
“आप पढ़ी-लिखी हैं, जॉब क्यों नहीं करतीं?”
तो माया का जवाब दिल को चीर देता है—
“जॉब करूँगी तो पूरा दिन निकल जाएगा,
कॉलेज नहीं जा पाऊँगी।
इसलिए ये काम चुना है —
ताकि पढ़ाई भी चलती रहे और घर भी।”
यह कोई बनावटी कहानी नहीं है।
मीडिया ने खुद ठाणे की सड़कों पर माया को देखा,
उसकी मेहनत को कैमरे में कैद किया।
माया अकेली नहीं है।
उसके जैसी लाखों सवर्ण / ब्राह्मण बच्चे
इस देश में हैं —
जो पढ़ाई के साथ मजदूरी करते हैं,
स्टॉल लगाते हैं,
ट्यूशन पढ़ाते हैं,
सब्ज़ी बेचते हैं।
लेकिन सवाल यह है —
उनकी पीड़ा पर चुप्पी क्यों?
आरक्षण : उद्देश्य सही, लेकिन क्या ज़मीनी हकीकत भी?
आरक्षण इस देश में
सामाजिक न्याय के लिए लाया गया था।
इसमें कोई दो राय नहीं।
लेकिन आज सवाल यह उठता है कि—
क्या मौजूदा व्यवस्था
गरीब लेकिन सवर्ण बच्चों की प्रतिभा को कुचल नहीं रही?
माया जैसी लड़कियाँ
दिन में मेहनत करती हैं,
रात में पढ़ती हैं,
अंक भी अच्छे लाती हैं।
लेकिन जब बात आती है
कॉलेज की सीट की,
सरकारी नौकरी की—
तो उनके सामने एक दीवार खड़ी हो जाती है।
मेरिट है, मेहनत है,
लेकिन अवसर नहीं।
EWS — नाम का सहारा, ज़मीन पर बेकार
सरकार ने EWS का नाम दिया।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है—
सीटें बहुत कम
कटऑफ फिर भी ऊँचा
फीस में राहत न के बराबर
हॉस्टल, स्कॉलरशिप, कोचिंग — लगभग शून्य
EWS आज
सहारा नहीं, सिर्फ तसल्ली बनकर रह गया है।
माया जैसे बच्चों को
EWS से कोई वास्तविक ताकत नहीं मिलती।
यह विरोध नहीं है — यह सवाल है
यह पोस्ट
आरक्षण के खिलाफ नहीं है।
यह सवाल है—
क्या गरीबी जाति देखकर आती है?
क्या प्रतिभा का कोई वर्ग होता है?
क्या सवर्ण गरीब होना अपराध है?
अगर आरक्षण सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए है,
तो फिर
गरीब सवर्ण बच्चों को किस आधार पर बाहर रखा गया?
वे भी इसी देश के नागरिक हैं।
उनका भी भविष्य है।
उनकी भी मेहनत है।
सुधार की ज़रूरत है, टकराव की नहीं
देश को चाहिए—
EWS को व्यवहारिक बनाना
उसका दायरा बढ़ाना
फीस, स्कॉलरशिप, कोचिंग, हॉस्टल में वास्तविक राहत
और सबसे ज़रूरी —
मेरिट और मेहनत का सम्मान
**माया एक चेहरा है…
पीड़ा करोड़ों की है**
माया की मुस्कान के पीछे
जो दर्द है,
वह सिर्फ उसकी कहानी नहीं।
यह उस पीढ़ी की कहानी है
जो चुपचाप मेहनत करती है,
लेकिन जिसकी आवाज़ कोई नहीं सुनता।
यह लेख नहीं,
एक करुण पुकार है।
समाज से,
नीति-निर्माताओं से,
और हम सब से।
| धर्म | समुदाय जिन्हें आरक्षण नहीं |
|---|---|
| हिंदू | ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार, वैश्य |
| मुस्लिम | सैयद, शेख, पठान, मुगल |
| सिख | जाट सिख, खत्री, अरोड़ा |
| ईसाई | सीरियन क्रिश्चियन, जनरल क्रिश्चियन |
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