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तेज़ाब की आग – चंदा बाबू और उनके तीन पुत्रों की कहानी

एक पिता की इंसाफ़ के लिए अडिग लड़ाई, राजनीतिक अपराध के खिलाफ़ आम नागरिक की जंग”
7 November 2025 by
तेज़ाब की आग – चंदा बाबू और उनके तीन पुत्रों की कहानी
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“तेज़ाब ने मेरे बच्चों को जलाया है, लेकिन मेरे अंदर की आग को नहीं बुझा सकता।” — चंदा बाबू

🩸 तेज़ाब कांड – सिवान की वो दहला देने वाली रात जिसने इंसाफ़ को पुकारा

शहाबुद्दीन की क्रूरता और चंदा बाबू की इंसाफ़ के लिए अडिग लड़ाई की कहानी

🕯️ भूमिका

यह कहानी बिहार के सिवान ज़िले की है — जहाँ सत्ता और अपराध की मिलीभगत ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया।

2004 का वो साल जब एक बाहुबली नेता की दहशत के आगे पूरा ज़िला काँपता था, और एक आम पिता, चंदा बाबू, अपने तीन बेटों के साथ न्याय की उम्मीद में जी रहे थे।

लेकिन एक दिन उनकी दुनिया तेज़ाब की आग में जलकर खाक हो गई।

🔥 तेज़ाब की रात – जब इंसानियत जल उठी

16 अगस्त 2004 की रात —

चंदा बाबू के दो बेटे, गौरव और सतीश, को कुछ गुंडों ने अगवा कर लिया।

अगले दिन जब उनकी लाशें मिलीं, तो किसी ने सोच भी नहीं सकता था कि कोई इंसान इतनी निर्ममता तक जा सकता है।

गवाहों ने बताया —

“उन्हें तेज़ाब से नहलाया गया था... शरीर की चमड़ी गल चुकी थी, हड्डियाँ दिख रही थीं।”

यह कोई सामान्य हत्या नहीं थी, बल्कि सत्ता का प्रदर्शन था —

एक संदेश कि “सत्ता के खिलाफ़ आवाज़ उठाने की सज़ा क्या होती है।”

⚖️ एक पिता की लड़ाई – डर के खिलाफ़ जिद्द

जिस वक़्त पूरा सिवान डर के साये में चुप था,

चंदा बाबू खड़े हुए — अकेले, टूटे हुए, लेकिन अडिग।

उन्होंने FIR दर्ज कराई, गवाही दी, और अपने बेटों के हत्यारों को सज़ा दिलाने की कसम खाई।

उनके तीसरे बेटे भरत ने भी इस केस में गवाही दी —

लेकिन 2014 में उसे भी गोली मार दी गई।

फिर भी, चंदा बाबू ने हार नहीं मानी।

हर सुनवाई में, हर तारीख़ पर, वो अदालत के बाहर अपने बेटों की तस्वीर लेकर खड़े रहते थे।

⛓️ शहाबुद्दीन की गिरफ़्तारी और अदालत का फैसला

लंबी कानूनी जद्दोजहद के बाद,

2015 में विशेष अदालत ने शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सज़ा सुनाई,

और 2017 में पटना हाई कोर्ट ने उस सज़ा को बरकरार रखा।

यह फैसला सिर्फ़ एक केस की जीत नहीं थी —

यह डर के खिलाफ़ न्याय की जीत थी।

💔 क्रूरता का प्रतीक, उम्मीद का नाम – चंदा बाबू

तेज़ाब की आग में जलकर भी जो इंसाफ़ की लौ जलाते रहे —

वो थे चंदा बाबू।

उनकी कहानी आज हर उस आम नागरिक के लिए प्रेरणा है,

जो अन्याय के आगे झुकने से इंकार करता है।

“तेज़ाब ने मेरे बच्चों को जलाया है,

लेकिन मेरे अंदर की आग को नहीं बुझा सकता।” — चंदा बाबू

📚 सीख और संदेश

  • सत्ता और अपराध का गठजोड़ समाज को भीतर तक सड़ा देता है।
  • लेकिन अगर एक आम नागरिक ठान ले, तो सच्चाई जीतती है।
  • इंसाफ़ देर से आता है, पर आता ज़रूर है — बस लड़ाई सच्ची होनी चाहिए।

2004 में बिहार के सिवान जिले में एक ऐसा कांड हुआ जिसने पूरे राज्य को दहला दिया।

चंदा बाबू, जो एक छोटे व्यवसायी और पिता थे, ने अपने दो बेटों — सतिश राज और गौरव राज — को क्रूर तरीके से खो दिया।

मोहम्मद शाहबुद्दीन और उनके सहयोगियों द्वारा orchestrated यह कांड केवल हत्या नहीं थी, बल्कि यह एक सत्ता और डर का प्रदर्शन था।

घटना क्रम 

16 अगस्त 2004

  • चंदा बाबू के तीन बेटे अचानक घर से गायब।
  • परिवार और पड़ोसियों ने तलाश शुरू की।

अगवा और हमला

  • सतिश और गौरव को किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया।
  • आरोप है कि वहां दोनों को तेज़ाब से भिगोकर अत्यंत दर्दनाक तरीके से मारा गया।
  • तीसरा बेटा राजीव रोशन भागने में सफल रहा।

FIR और प्रारंभिक जांच

  • चंदा बाबू ने स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई।
  • पुलिस ने प्रारंभिक जाँच की, लेकिन राजनीतिक दबाव और बाहुबलियों के डर से जांच धीमी हुई।

गवाह और अदालत में गवाही

  • राजीव रोशन ने अदालत में जाकर अपराध की पूरी कहानी बताई।
  • इस दौरान उनके जीवन पर लगातार खतरा बना रहा।

2014

  • राजीव रोशन को भी गोली मार दी गई, जिससे यह मामला और संवेदनशील और जटिल बन गया।

आरोपी और अपराध का स्वरूप

  • मुख्य आरोपी: मोहम्मद शाहबुद्दीन (उस समय सांसद)
  • सहयोगी: राज कुमार साह, शेख़ आसलाम, अरिफ़ हुसैन (मोणू)
  • अपराध की प्रकृति: अगवा करना, तेज़ाब का प्रयोग, हत्या, और डर का प्रदर्शन
  • मकसद: राजनीतिक और संपत्ति विवाद के चलते विरोधियों को खत्म करना और भय फैलाना

साक्ष्य और गवाह

प्रमुख गवाह

  1. राजीव रोशन
    • अगवा होने के दौरान अपने भाईयों के साथ था।
    • भागकर बचने के बाद अदालत में गवाही दी।
    • गवाही में उसने बताया कि आरोपी ने खुद इस अपराध की योजना बनाई और गुंडों को अंजाम देने का आदेश दिया।
  2. चंदा बाबू (पिता)
    • FIR दर्ज कराया।
    • कोर्ट में लगातार मामले की निगरानी की और न्याय की लड़ाई में सहयोग दिया।

पुलिस और न्यायिक दस्तावेज़

  • FIR में अगवा होने और हत्या की क्रूरता का विवरण
  • अपराध स्थल की तस्वीरें और प्रारंभिक सबूत
  • गवाहों और स्थानीय लोगों की पहचान

कोर्ट की प्रक्रिया और फैसला

  • विशेष अदालत (2015): शाहबुद्दीन और सहयोगियों को उम्रकैद की सजा
  • Patna High Court (2017): फैसले को बरकरार रखा
  • कोर्ट की टिप्पणियाँ:
    • यह अपराध “rare-of-rare” श्रेणी में आता है।
    • राजनीतिक दबाव और भय फैलाने के बावजूद अदालत ने निष्पक्ष निर्णय दिया।
  • साक्ष्य की पुष्टि:
    • गवाह की गवाही
    • आरोपी की गतिविधियों और योजना
    • हत्या की क्रूर प्रकृति और तेज़ाब के प्रयोग की पुष्टि

अपराध की क्रूरता

  • तेज़ाब डालना एक अत्यंत दर्दनाक और स्थायी विकलांगता पैदा करने वाला तरीका है।
  • चंदा बाबू के बेटे केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक तौर पर भी अत्यंत पीड़ा सह रहे थे।
  • यह हत्या सिर्फ प्रत्यक्ष हत्या नहीं थी, बल्कि लोगों में भय और आतंक पैदा करने के उद्देश्य से की गई थी।

सामाजिक और राजनीतिक असर

  • आम नागरिकों में डर और हताशा पैदा हुई।
  • राजनीतिक अपराध और बाहुबलियों के खिलाफ़ चेतना बढ़ी।
  • अदालत का फैसला यह संदेश देता है कि अगर आम नागरिक और पीड़ित परिवार न्याय के लिए लगातार लड़ें, तो शक्ति और भ्रष्टाचार भी कमजोर पड़ सकते हैं।

निष्कर्ष

तेज़ाब कांड केवल हत्या की कहानी नहीं है।

यह एक पिता की अडिग लड़ाई, सत्ता और अपराध के खिलाफ आम नागरिक की जंग, और कानूनी प्रणाली की मजबूती की मिसाल है।

चंदा बाबू और उनके परिवार की कहानी हमें याद दिलाती है कि सच्चाई और न्याय की राह में कठिनाइयाँ आएंगी, लेकिन यह पूरी तरह खत्म नहीं होती।

सीख और संदेश

  1. सत्ता और अपराध के गठजोड़ के खिलाफ़ सतर्क रहना ज़रूरी है।
  2. आम नागरिकों को अपने अधिकारों और न्याय के लिए लड़ना चाहिए।
  3. गवाह सुरक्षा और कानूनी प्रक्रिया की मजबूती न्याय की आधारशिला है।
  4. समाज में डर और हिंसा के बावजूद न्याय की उम्मीद बनाए रखना आवश्यक है

न्याय देर से मिलता है, पर मिलता ज़रूर है — अगर लड़ाई सच्ची हो तो।

तेज़ाब की आग – चंदा बाबू और उनके तीन पुत्रों की कहानी
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