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बाबा साहब अंबेडकर : संघर्ष अकेले का नहीं था, सहयोग पूरे समाज का था

पढ़ाई से लेकर अंतिम समय तक किन लोगों ने दिया बाबा साहब का साथ—तथ्यों के साथ विशेष रिपोर्ट
8 February 2026 by
बाबा साहब अंबेडकर : संघर्ष अकेले का नहीं था, सहयोग पूरे समाज का था
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पढ़ाई से लेकर अंतिम समय तक : डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ कौन खड़ा रहा

तथ्य, इतिहास और संदर्भों के साथ विशेष स्टोरी

नई दिल्ली | फीचर रिपोर्ट

6 दिसंबर 1956। दिल्ली के 26, अलीपुर रोड स्थित एक शांत घर में भारत का संविधान निर्माता अंतिम सांस लेता है। आज यही स्थान Dr. Ambedkar National Memorial के नाम से जाना जाता है। लेकिन यह घर केवल एक स्मारक नहीं है—यह उस दौर की कहानी कहता है, जब सत्ता से बाहर हो चुके डॉ. भीमराव अंबेडकर को सम्मान और सहारा मिला।

यह कहानी यहीं से शुरू नहीं होती। इसकी जड़ें शिक्षा, संघर्ष और सहयोग के उन अध्यायों में हैं, जिन्हें आज अक्सर अधूरा बताया जाता है।

अध्याय 1 : शिक्षा—जहाँ संघर्ष था, लेकिन रास्ता बंद नहीं था

डॉ. अंबेडकर का जन्म 1891 में एक ऐसे समाज में हुआ, जहाँ सामाजिक भेदभाव रोज़मर्रा की सच्चाई थी। बावजूद इसके, उनकी बौद्धिक क्षमता इतनी प्रखर थी कि उसे नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं था।

1913 में बड़ौदा रियासत (गायकवाड़ शासन) की छात्रवृत्ति पर वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी, अमेरिका पहुँचे। इसके बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और ग्रेज़ इन में अध्ययन किया।

यह तथ्य इस बात की पुष्टि करता है कि उस दौर में भी संस्थान और शासक वर्ग योग्यता को पहचान रहे थे

संदर्भ:

  • Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. 1

  • Dhananjay Keer, Dr. Ambedkar: Life and Mission

अध्याय 2 : संविधान और राष्ट्रीय जिम्मेदारी

स्वतंत्रता के बाद डॉ. अंबेडकर को

  • संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष बनाया गया

  • वे स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री बने

यह चयन किसी भावनात्मक राजनीति का परिणाम नहीं था, बल्कि कानूनी विद्वता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का परिणाम था।

संदर्भ:

  • Constituent Assembly Debates

  • Granville Austin, The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation

अध्याय 3 : इस्तीफा, बीमारी और एक घर

1951–52 में जब डॉ. अंबेडकर ने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया, तब हालात बदले।

  • सरकारी आवास नहीं रहा

  • स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था

इसी समय सिरोही रियासत के महाराजा अभय सिंह जी ने अपना निजी आवास 26, अलीपुर रोड, दिल्ली उन्हें रहने के लिए दिया।

यहीं डॉ. अंबेडकर ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए।

आज यह भवन सरकारी रिकॉर्ड में Dr. Ambedkar National Memorial के रूप में दर्ज है।

संदर्भ:

  • Ministry of Social Justice & Empowerment, भारत सरकार

  • Dhananjay Keer

  • आधिकारिक स्मारक दस्तावेज़

अध्याय 4 : आर्थिक सहयोग—जहाँ विचार देखे गए, पहचान नहीं

इतिहास यह भी दर्ज करता है कि डॉ. अंबेडकर के कार्यों के लिए

  • जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह

  • बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह

ने आर्थिक सहयोग दिया।

यह सहयोग किसी जातीय पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार और बौद्धिक योगदान को देखकर दिया गया।

संदर्भ:

  • C. B. Khairmode, Dr. Ambedkar: Charitra

  • जीवनी और अभिलेखीय उल्लेख

अध्याय 5 : बुद्ध, बौद्ध धर्म और अंबेडकर

गौतम बुद्ध का जन्म शाक्य वंश (क्षत्रिय) में हुआ—यह इतिहास में स्थापित तथ्य है।

लेकिन बुद्ध ने स्वयं जन्म आधारित श्रेष्ठता को नकारा।

डॉ. अंबेडकर ने 1956 में बौद्ध धर्म इसलिए अपनाया क्योंकि उसमें

  • समानता

  • तर्क

  • और करुणा

    का दर्शन था।

संदर्भ:

  • B. R. Ambedkar, The Buddha and His Dhamma

  • Romila Thapar, Early India

अध्याय 6 : भारत रत्न—राष्ट्र की स्वीकृति

1990 में प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह की सरकार ने डॉ. अंबेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया।

यह निर्णय किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि राष्ट्र की ओर से संविधान निर्माता को दिया गया सम्मान था।

संदर्भ:

  • Gazette of India, 1990

  • प्रधानमंत्री कार्यालय के अभिलेख

अंतिम अध्याय : आज का सवाल

इतिहास के ये पन्ने बताते हैं कि

डॉ. अंबेडकर के जीवन में

  • पढ़ाई के समय

  • संवैधानिक जिम्मेदारियों में

  • और अंतिम वर्षों में

    विभिन्न जातियों और वर्गों के लोगों का सहयोग मौजूद था

आज जब उनके नाम पर

  • समाज को बाँटने की भाषा

  • और आधे-अधूरे तथ्यों

    का सहारा लिया जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है—

क्या हम अंबेडकर को समझ रहे हैं, या उनका इस्तेमाल कर रहे हैं?

निष्कर्ष

डॉ. भीमराव अंबेडकर

  • किसी एक जाति या वर्ग के नहीं थे

  • वे संविधान, तर्क और समानता के प्रतिनिधि थे

उनकी जीवन-कथा यह सिखाती है कि

संघर्ष के साथ सहयोग भी इतिहास का सच होता है।

आज ज़रूरत है—

इतिहास को पूरा पढ़ने की,

और अंबेडकर को जोड़ने की शक्ति के रूप में देखने की।

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