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A Father Carries His Son’s Body in a Bag: A Shocking Mirror of System Failure in Jharkhand

जब झारखंड में “खास लोगों” के लिए लाखों की सैलरी और बंगले हैं, तो क्या गरीब आदिवासी बच्चे के लिए एक एम्बुलेंस भी नहीं?
21 December 2025 by
A Father Carries His Son’s Body in a Bag: A Shocking Mirror of System Failure in Jharkhand
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थैले में मासूम की ला*श: झारखंड में सिस्टम फेल, इंसानियत शर्म*सार

📰 खबर विस्तार (विस्तृत समाचार रिपोर्ट)

अंधेरी रात, ठंड से कांपता बदन और सूनी आंखों में जमी बेबसी…

यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, बल्कि झारखंड की उस कड़वी सच्चाई का है, जिसने एक बार फिर पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

झारखंड के एक दूरदराज़ इलाके में रहने वाला एक गरीब आदिवासी पिता अपने चार साल के मासूम बेटे को इलाज के लिए अस्पताल लेकर पहुंचा। लेकिन किस्मत ने यहां भी उसका साथ नहीं दिया। अस्पताल में न तो समुचित इलाज मिला, न समय पर डॉक्टर उपलब्ध हुए। और जब इलाज के अभाव में मासूम की मौ*त हो गई, तब शुरू हुआ उस पिता के जीवन का सबसे द*र्दनाक सफर।

👉 न एम्बुलेंस मिली, न कोई सरकारी वाहन

👉 न कोई अधिकारी, न कोई संवेदना

पैसे नहीं थे, साधन नहीं थे। मजबूर पिता ने अपने बेटे के नि*र्जीव शरीर को एक थैले में रखा, कंधे पर उठाया और पैदल ही चल पड़ा। यह सिर्फ एक पिता का दर्द नहीं था, यह झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था का पोस्ट*मार्टम था।

⚖️ यहीं से उठते हैं सबसे कड़वे सवाल

एक तरफ खबरें आती हैं कि

झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री द्वारा बिहार के एक डॉक्टर को—

बिना किसी परीक्षा, बिना प्रक्रिया—

तीन लाख रुपये मासिक वेतन, सरकारी बंगला और विशेष सुविधाएं ऑफर की जाती हैं,

वो भी सिर्फ धर्म और जाति के आधार पर—ऐसा आरोप लग रहा है।

और दूसरी तरफ…

👉 झारखंड का अपना गरीब आदिवासी बच्चा

👉 जिसे न डॉक्टर मिला

👉 न दवा

👉 न एम्बुलेंस

👉 न मौत के बाद सम्मानजनक विदाई

अंतरात्मा को झकझोरने वाले सवाल

  1. क्या झारखंड की सरकार सिर्फ “खास लोगों” के लिए बनी है?

  2. जिन गरीबों के वोट से सरकार बनी, उनके बच्चों के लिए क्या व्यवस्था है?

  3. क्या आदिवासी बच्चे की जान, किसी बाहरी डॉक्टर की सैलरी से सस्ती है?

  4. अगर यही बच्चा किसी नेता या अफसर का होता, तो क्या तस्वीर यही होती?

  5. क्या एम्बुलेंस सिर्फ आंकड़ों और विज्ञापनों में ही मौजूद है?

  6. क्या स्वास्थ्य मंत्री जवाब देंगे कि एक पिता को अपने बेटे की ला*श थैले में क्यों ढोनी पड़ी?

  7. क्या यह सिर्फ एक घटना है, या झारखंड के गरीबों की रोज़ की कहानी?

🔥 निष्कर्ष

यह तस्वीर सिर्फ एक शव की नहीं है।

यह सिस्टम की नाकामी,

सरकार की संवेदनहीनता,

और हमारे समाज की चुप्पी की तस्वीर है।

जब तक ऐसी घटनाएं हमें झकझोरती नहीं,

जब तक हम सवाल नहीं पूछते,

तब तक अगला पिता भी अपने बच्चे को ऐसे ही उठाकर चलता रहेगा—

और हम सिर्फ मोबाइल स्क्रीन पर स्क्रॉल करते रहेंगे।

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