1990 का दशक बिहार के इतिहास में अपराध, जातीय संघर्ष और बाहुबली राजनीति के लिए जाना जाता है। इसी दौर में नवादा और शेखपुरा क्षेत्र में अशोक महतो का नाम तेजी से उभरा। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार, उनका गिरोह इस क्षेत्र में सक्रिय था और कई गंभीर आपराधिक मामलों में उसका नाम सामने आया।
बताया जाता है कि उस समय विभिन्न बाहुबली समूहों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी। अशोक महतो का गैंग और दूसरे प्रभावशाली गिरोहों के बीच वर्षों तक संघर्ष रहा, जिसका असर स्थानीय कानून-व्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर पड़ा।
अफसढ़ नरसंहार
साल 2000 में हुए अफसढ़ नरसंहार में अशोक महतो गिरोह का नाम जांच और समाचार रिपोर्टों में सामने आया। यह घटना बिहार के जातीय संघर्षों से जुड़ी चर्चित घटनाओं में गिनी जाती है।
नवादा जेल ब्रेक
2001–2002 के दौरान नवादा जेल से फरारी की घटना ने पूरे बिहार को हिला दिया। इस मामले में अशोक महतो को बाद में दोषी ठहराया गया और उन्होंने लंबी जेल सजा काटी। सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार, वे लगभग 17 वर्ष जेल में रहे और 2023 में रिहा हुए।
राजो सिंह हत्याकांड
पूर्व सांसद राजो सिंह की हत्या के मामले में भी अशोक महतो का नाम आरोपियों में शामिल था। हालांकि, बाद में अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें इस मामले में बरी कर दिया। इसलिए इस मामले को दोषसिद्धि के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।
जेल से राजनीति तक
रिहाई के बाद अशोक महतो फिर चर्चा में आए। दोषसिद्धि के कारण वे स्वयं चुनाव नहीं लड़ सकते थे, इसलिए 2024 में उनकी पत्नी अनीता महतो को चुनाव मैदान में उतारा गया। इसके बाद उनका परिवार बिहार की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने लगा।
निष्कर्ष
अशोक महतो की कहानी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि 1990 के दशक के बिहार की उस जटिल पृष्ठभूमि की भी कहानी है, जहाँ अपराध, जातीय तनाव और राजनीति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहे। उनके जीवन से जुड़े मामलों में कुछ में दोषसिद्धि हुई, जबकि कुछ मामलों में अदालत ने उन्हें बरी किया। इसलिए किसी भी ऐतिहासिक या पत्रकारिता सामग्री में इन दोनों स्थितियों का अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।