भारत को स्वतंत्र हुए अभी कुछ ही महीने बीते थे कि 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि देश की आत्मा पर गहरा आघात था। लेकिन इस दुखद घटना के बाद जो कुछ महाराष्ट्र के कई हिस्सों में हुआ, वह आज भी इतिहास के सबसे विवादित और कम चर्चित अध्यायों में गिना जाता है।
गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे द्वारा की गई थी, जो चितपावन ब्राह्मण समुदाय से संबंध रखते थे। इसी पहचान को आधार बनाकर महाराष्ट्र के कई शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में पूरे समुदाय को सामूहिक प्रतिशोध का शिकार बनाया गया। पुणे, मुंबई, नागपुर, सतारा, कोल्हापुर सहित अनेक स्थानों पर चितपावन ब्राह्मण परिवारों को निशाना बनाया गया।
प्रत्यक्षदर्शियों और बाद के कुछ स्वतंत्र शोधों के अनुसार, कई इलाकों में संगठित भीड़ ने घरों को चिन्हित कर आग लगाई, लोगों से उनकी जाति पूछकर हिंसा की गई, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ और परिवारों को अपना सब कुछ छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा। भय का ऐसा वातावरण बना कि कई परिवार रातों-रात अपने पैतृक गांव और शहर छोड़कर अन्य राज्यों में पलायन कर गए।
इतिहासकार बताते हैं कि यह हिंसा पूरी तरह आकस्मिक नहीं थी। कुछ जगहों पर यह पहले से फैले आक्रोश, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक निष्क्रियता का परिणाम मानी जाती है। आरोप यह भी लगाए जाते रहे हैं कि उस समय की सत्ता से जुड़े कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं ने हिंसा को रोकने के बजाय मौन या अप्रत्यक्ष समर्थन दिया। हालांकि, इन आरोपों पर आज तक कोई व्यापक और निष्पक्ष न्यायिक जांच नहीं हो सकी।
इस दौर में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर का नाम भी सामने आता है। उनके घर पर हमला हुआ और उनके परिवार को गंभीर नुकसान झेलना पड़ा। कई प्रतिष्ठित और साधारण परिवार एक ही तरह की त्रासदी का शिकार बने—रोज़गार छिन गया, सामाजिक बहिष्कार हुआ और आर्थिक स्थिति पूरी तरह चरमरा गई।
मृतकों की वास्तविक संख्या आज भी विवाद का विषय है। सरकारी आंकड़े बहुत सीमित हैं, जबकि कुछ इतिहासकारों और सामाजिक अध्ययनों में मृतकों की संख्या सैकड़ों से लेकर हजारों तक बताई जाती है। पुलिस रिकॉर्ड, एफआईआर और प्रशासनिक दस्तावेजों का बड़ा हिस्सा या तो उपलब्ध नहीं है या समय के साथ दबा दिया गया।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन घटनाओं के लिए शायद ही किसी को सजा मिली हो। न तो बड़े स्तर पर मुकदमे चले और न ही पीड़ितों को कोई संगठित मुआवजा या आधिकारिक मान्यता मिली। परिणामस्वरूप, यह त्रासदी पीढ़ियों तक स्मृति, मौखिक इतिहास और व्यक्तिगत पीड़ा में ही सिमट कर रह गई।
1948 की ये घटनाएँ हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या स्वतंत्र भारत में न्याय सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध था। यह भी प्रश्न उठता है कि क्या किसी एक व्यक्ति के अपराध का दंड पूरे समुदाय को दिया जाना उचित हो सकता है।
इतिहास केवल वही नहीं होता जो पाठ्यपुस्तकों में लिखा जाए, बल्कि वह भी होता है जिसे समय, सत्ता और सुविधा के अनुसार अनदेखा कर दिया जाता है। 1948 की ये घटनाएँ आज भी एक निष्पक्ष मूल्यांकन, स्वीकार्यता और संवाद की प्रतीक्षा कर रही हैं, ताकि भविष्य में किसी भी समुदाय के साथ ऐसा अन्याय दोबारा न हो।